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बद्रीनाथ। बद्रीनाथ में चल रही रामकथा के पांचवे दिन मोरारी बापू ने कहा कि शंकराचार्य के मत से योग क्या है। अपरिग्रह वाक् निरोध: वाणी का निरोध योग है।। किसी से आशा न करना वह भी योग है।। बापू ने कहा कि रज सूखी होती है रज पाने वाला सुखी हो जाता है! और रजका अंजन हो सकता है? परसत पद पावन शोक नसावन। प्रगट भई तप पुंज सहि। अहल्या के प्रसंग में रज का महत्व मिलता है।। शंकराचार्य जी ने यह लिखा है गीता का गान करो। ऐसा भी लिखा है सहस्त्रनाम का पाठ करो।यह भी कहा लेकिन एक ही नाम बार-बार हजार बार रटें वह भी सहस्त्रनाम है।घयेयं श्रीपति रूपम… श्री विष्णु का ध्यान करो।मतलब? संकीर्णता का नहीं लेकिन विशालता का ध्यान करो। व्यास का अर्थ भी विशाल है।तुम्हारी बुद्धि चित् को सज्जन के पास ले जाओ और यदि आपके पास वित्त है तो गरीबों को बांट दो। बापू ने कहा कि ब्रह्मसूत्र उपनिषद् आदि तीन ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद आचार्य पद मिलता है।।शांकर भाष्य, गीता भाष्य उपनिषद और ब्रह्मसूत्र का अवलोकन करने से लगता है कि व्यास जी का ब्रह्मसूत्र बहुत क्लिस्ट है।। फिर भी आचार्य जी ने बहुत कृपा की है। अक्षर थोड़े और अर्थ बहुत है।
बापू ने बताया कि सब संख्या उत्तम है फिर भी नव का अंक विशेष है,पूर्णांक भी है शून्य भी है,रिक्त है। रामचरितमानस के मंगलाचरण में नव की वंदना की गई है। यहां सप्तक भी बहुत है।अष्टक भी है और पंचक भी है।। मंगलाचरण के श्लोक सात है। एक एक श्लोक एक-एक सोपान का प्रतिनिधित्व करते हैं।। लेकिन इन ७ श्लोकों में नव की वंदना की गई है।। पहले श्लोक में वाणी और विनायक। दूसरे श्लोक में भवानी और शंकर की वंदना।तीसरे श्लोक में बोधमई गुरु शिव की वंदना,चौथे श्लोक में कवीश्वर वाल्मीकि और कपीश्वर हनुमान की वंदना,पांचवे श्लोक में सीता और फिर अकेले राम की वंदना।। ये सात की वंदना है।। मानस में गोस्वामी जी को दृढ़ता से कुछ सिद्ध करना है तो सभी को नव में डाल देते हैं।।परशुराम की स्तुति में नव बार जय-जय शब्द आया है।।जैसे अंडज,स्वेदज और अन्य जीव होते हैं वैसे ही हम प्रकाश से जन्मे है तो हम भी सूर्यवंशी कहे जाने वाले हो सकते हैं। बापू ने बताया कि सुमंत राम को वन में छोड़ कर लौटता है तो नव प्रकार के सोच अफसोस की बात की गई है। तो यहां ग्रंथों संतो गुरु कृपा और कुछ अपनी अनुभूति से व्यास जी के विराग की चर्चा, नव प्रकार के व्यास विराग है।।वैसे व्यास पुत्र शुकदेव का वैराग आखिरी है। वह परमहंस के भी परमहंस है।।जन्म के साथ नाभि की ओर को गले में डाल कर निकल गए।।उसकी बैराग की तो क्या बात करें! लेकिन शुक तो आम फल है।एक पल में इतना वैराग तो जिन शाखा से वह फल उतरा है वह व्यास में कितना वैराग होगा!व्यास लगते हैं संसारी लेकिन फल का दर्शन करने से लगता है कि कितना वैरागी होगा। बापू ने कथा प्रवाह में शिव विवाह की कथा संक्षिप्त में बताकर राम जन्म के कारण और राम जन्म तक की कथा का विस्तार से वर्णन करके आज की कथा को विराम दिया।
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