गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। हालांकि चुनाव में अभी समय है, लेकिन प्रदेश में कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो आने वाले समय में सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। माना जा रहा है कि यदि इस बार जनता इन सवालों को मजबूती से उठाती है, तो चुनाव केवल चेहरों और नारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जनसरोकारों की असली लड़ाई बन सकता है।
प्रदेश में सबसे बड़ा मुद्दा लगातार बढ़ता पलायन माना जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों के हजारों गांव खाली होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। गांवों में खेती बंजर हो रही है और युवा रोजगार की तलाश में देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। कई गांवों में अब केवल बुजुर्ग ही रह गए हैं। ऐसे में आगामी चुनाव में जनता सरकारों से पूछ सकती है कि आखिर पलायन रोकने और गांवों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए अब तक क्या ठोस प्रयास हुए।
बेरोजगारी भी युवाओं के बीच बड़ा मुद्दा बन चुकी है। भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के मामलों ने युवाओं का भरोसा व्यवस्था से कमजोर किया है। वर्षों तक तैयारी करने वाले अभ्यर्थी पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और समय पर नियुक्तियों की मांग कर रहे हैं। सेना भर्ती, पुलिस भर्ती और समूह-ग परीक्षाओं को लेकर उठे सवाल चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। इसी के साथ मूल निवास और सख्त भू-कानून की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। प्रदेश के कई सामाजिक संगठन लगातार हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर मजबूत भू-कानून लागू करने की मांग कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीद बढ़ने से स्थानीय लोगों की जमीन, संस्कृति और पहचान पर खतरा बढ़ रहा है।
आपदा और विस्थापन का मुद्दा भी इस बार चुनाव में प्रमुख रह सकता है। जोशीमठ भूधंसाव ने पूरे देश का ध्यान उत्तराखंड की संवेदनशीलता की ओर खींचा था। इसके अलावा बादल फटना, भूस्खलन और सड़क धंसने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। प्रभावित परिवार आज भी स्थायी पुनर्वास और पर्याप्त मुआवजे की मांग कर रहे हैं। लोगों का आरोप है कि पहाड़ों में बिना वैज्ञानिक अध्ययन के अंधाधुंध निर्माण किया जा रहा है।
स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति भी ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता का विषय बनी हुई है। पहाड़ों में डॉक्टरों की कमी, बंद होते स्कूल और तकनीकी शिक्षा संस्थानों का अभाव लगातार सवाल खड़े कर रहा है। वहीं युवाओं में बढ़ते नशे और शराब के खिलाफ महिलाओं का आक्रोश भी सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस बार जनता जातीय और भावनात्मक राजनीति से ऊपर उठकर इन मुद्दों पर जवाब मांगती है, तो आगामी विधानसभा चुनाव का पूरा स्वरूप बदल सकता है। गांव-गांव में जनसंवाद, प्रत्याशियों से लिखित वादे और पांच साल का रिपोर्ट कार्ड मांगने जैसी पहल चुनाव को वास्तव में मुद्दा आधारित बना सकती है।
अब देखना यह होगा कि आने वाले चुनावों में राजनीतिक दल जनता के इन सवालों का जवाब देने के लिए ठोस रोडमैप पेश करते हैं या फिर चुनाव एक बार फिर वादों और नारों तक सीमित रह जाता है।

