उत्तराखंड के लिए चेतावनी, अब नदी किनारे बसावट पर नीति जरूरी
गोपेश्वर (चमोली)। नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में आई विनाशकारी जलप्रलय ने उत्तराखंड को एक बार फिर गंभीर चेतावनी दी है। हिमस्खलन, ग्लेशियर टूटने और ग्लेशियर झीलों के फटने जैसी घटनाओं का खतरा अब हिमालय के दूरस्थ क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। जलवायु परिवर्तन के बीच इन घटनाओं की तीव्रता और अनिश्चितता बढ़ रही है। ऐसे में उत्तराखंड में नदियों के किनारे बसी आबादी, जल विद्युत परियोजनाओं, सड़कों और पर्यटन ढांचे की सुरक्षा को लेकर नए सिरे से नीति बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
नेपाल में ऊपरी हिमालय से आने वाली नदियों में अचानक बढ़े जलस्तर और मलबे के साथ आए सैलाब ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। विशेषज्ञ ऐसी घटनाओं को ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ), हिमस्खलन और हिमालयी भूगर्भीय बदलावों से जोड़कर देखते हैं। ऊपरी क्षेत्र में प्राकृतिक बांध टूटने, ग्लेशियर या हिमखंड खिसकने से नदी और झील में अचानक पानी व मलबे का दबाव बढ़ सकता है, जिसका प्रभाव नदी के बहाव क्षेत्र में कई किलोमीटर नीचे तक पहुंच सकता है।
नेपाल की घटना उत्तराखंड के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों क्षेत्र एक ही हिमालयी भू-प्रणाली का हिस्सा हैं। उत्तराखंड की अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी, पिंडर और धौलीगंगा जैसी प्रमुख नदियां ग्लेशियरों और हिमालयी जलस्रोतों से पोषित होती हैं। ऊपरी हिमालय में होने वाली किसी बड़ी प्राकृतिक घटना का असर निचले क्षेत्रों में भी पहुंच सकता है।
इतिहास पहले भी दे चुका है चेतावनी
उत्तराखंड का इतिहास ऐसी घटनाओं की विनाशकारी क्षमता का गवाह रहा है। वर्ष 1894 में अलकनंदा घाटी में आई भीषण बाढ़ ने श्रीनगर तक व्यापक तबाही मचाई थी। यह घटना आज भी बताती है कि हिमालयी नदियों का अचानक बढ़ा जलप्रवाह कितनी दूर तक नुकसान पहुंचा सकता है।
वर्ष 1970 की अलकनंदा बाढ़ ने चमोली क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया। नदी किनारे बसे चमोली कस्बे को भारी नुकसान हुआ और बाद में जिला मुख्यालय को गोपेश्वर स्थानांतरित किया गया। यह घटना नदी घाटियों में बसी आबादी की संवेदनशीलता का बड़ा उदाहरण है।
इसके बाद वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा ने हिमालयी आपदा के खतरे को देश के सामने रख दिया। अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन, भूस्खलन और नदियों के अचानक उफान ने मंदाकिनी और अलकनंदा घाटियों में व्यापक तबाही मचाई। केदारनाथ के अलावा रुद्रप्रयाग, ऊखीमठ, अगस्त्यमुनि, बदरीनाथ घाटी और पिंडर क्षेत्र भी प्रभावित हुए।
रैणी ने बदला आपदा का आकलन
7 फरवरी 2021 को रैणी क्षेत्र में आई हिमस्खलनजनित आपदा ने धौलीगंगा घाटी को झकझोर दिया। रैणी और तपोवन क्षेत्र में जल विद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में बड़े निर्माण कार्यों और परियोजनाओं की योजना बनाते समय प्राकृतिक जोखिमों के वैज्ञानिक आकलन की जरूरत को और स्पष्ट किया।
धौलीगंगा जैसी नदी का अचानक विकराल रूप धारण करना यह बताता है कि किसी नदी को केवल पुराने अनुभवों के आधार पर सुरक्षित मानना जोखिम भरा हो सकता है। हिमालय की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और इसके साथ आपदा का स्वरूप भी बदल रहा है।
धराली और थराली क्षेत्र में सामने आई आपदाओं ने भी नदी किनारे बसे गांवों और कस्बों की संवेदनशीलता को उजागर किया है। पिंडर, अलकनंदा और अन्य नदियों में बाढ़ के दौरान सड़क, पुल, संपर्क मार्ग और तटीय बस्तियां प्रभावित होती रही हैं।
अब राहत नहीं, जोखिम घटाने की नीति जरूरी
उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हर आपदा के बाद राहत और पुनर्निर्माण तक सीमित रहने के बजाय संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान की जा रही है?
भू-विज्ञान विशेषज्ञ प्रो. एमपीएस बिष्ट के अनुसार हिमालय लगातार चेतावनी दे रहा है। 1894 की अलकनंदा बाढ़, 1970 की अलकनंदा आपदा और 2013 की केदारनाथ त्रासदी जैसी घटनाओं से सबक लेकर भविष्य के लिए ठोस तैयारी करनी होगी। इसके लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत करने के साथ नदी के तटवर्ती और संभावित बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में निर्माण व बसावट के स्पष्ट मानक तय करना जरूरी है।
सिर्फ नियम बनाना पर्याप्त नहीं होगा। नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में होने वाले निर्माण पर प्रभावी नियंत्रण, जोखिम वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक मानचित्रण और संवेदनशील आबादी के सुरक्षित पुनर्वास की व्यवस्था भी जरूरी होगी। राज्य की विकास योजनाओं को दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन नीति से जोड़ना अब समय की मांग है।
विकास और हिमालय की वहन क्षमता में संतुलन जरूरी
सड़क, जल विद्युत, तीर्थाटन और पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। लेकिन इनका विस्तार हिमालय की प्राकृतिक संवेदनशीलता और वहन क्षमता को ध्यान में रखकर करना होगा। अनियोजित और अत्यधिक निर्माण आपदा के प्रभाव को और गंभीर बना सकता है।
हिमालय को एशिया का ‘वाटर टावर’ कहा जाता है। यहां मौजूद ग्लेशियर और बर्फ करोड़ों लोगों की जल जरूरतों का महत्वपूर्ण आधार हैं। तापमान में बदलाव और ग्लेशियरों के सिकुड़ने से हिमालयी पारिस्थितिकी में हो रहे परिवर्तन भविष्य में ग्लेशियरजनित बाढ़ और अचानक आने वाले जलप्रवाह का खतरा बढ़ा सकते हैं।
नेपाल की त्रासदी से उत्तराखंड क्या सीखे
नेपाल की ताजा जलप्रलय उत्तराखंड के लिए चेतावनी के साथ अवसर भी है। राज्य को अब नदी किनारे की बसावट, पुलों और सड़कों का जोखिम आकलन, ग्लेशियर झीलों की निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम, स्थानीय स्तर पर त्वरित सूचना तंत्र और संवेदनशील आबादी के पुनर्वास की तैयारियों की समीक्षा करनी होगी।
हिमालय की चुनौती को खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक योजना, सुरक्षित बसावट और समय रहते चेतावनी देकर जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नेपाल की त्रासदी उत्तराखंड को यही संदेश दे रही है कि आपदा आने के बाद तैयारी करने के बजाय खतरे की पहचान पहले करनी होगी।
