गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। एक ओर सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में जुटी है। राज्य की राजनीति पर पिछले दो दशकों से भाजपा और कांग्रेस का वर्चस्व कायम रहा है, लेकिन इस बार उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) और आम आदमी पार्टी (आप) भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या ये दोनों दल चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बना पाएंगे अथवा केवल भाजपा और कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी तक सीमित रहेंगे।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकली उक्रांद के पास राज्य निर्माण की वैचारिक विरासत है। पार्टी आज भी भू-कानून, मूल निवास, स्थायी राजधानी, पलायन और स्थानीय युवाओं को रोजगार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। हालांकि पिछले कई चुनावों में उक्रांद संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व के बिखराव और सीमित जनाधार के कारण अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उक्रांद पर्वतीय क्षेत्रों में क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता के बीच ले जाने में सफल होती है तो कुछ सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकती है, लेकिन पूरे राज्य में तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित होना उसके लिए अभी भी बड़ी चुनौती है।
दूसरी ओर आम आदमी पार्टी भी उत्तराखंड में अपनी उपस्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रही है। दिल्ली और पंजाब मॉडल को आधार बनाकर राजनीति करने वाली पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद शहरी क्षेत्रों, युवा मतदाताओं और पारंपरिक राजनीति से असंतुष्ट वर्ग के बीच पार्टी अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि राज्य में मजबूत संगठनात्मक ढांचे और प्रभावशाली स्थानीय नेतृत्व का अभाव उसके सामने बड़ी बाधा बना हुआ है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उक्रांद और आप के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा और कांग्रेस के मजबूत चुनावी नेटवर्क को चुनौती देना है। दोनों राष्ट्रीय दलों के पास बूथ स्तर तक संगठन, संसाधन, प्रभावशाली नेतृत्व और व्यापक जनाधार मौजूद है। ऐसे में तीसरे मोर्चे की राजनीति को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा।
फिर भी इन दलों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई विधानसभा क्षेत्रों में उक्रांद और आप भले जीत की स्थिति में न हों, लेकिन वे भाजपा और कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं। खासकर उन सीटों पर जहां जीत-हार का अंतर कम रहता है, वहां तीसरे और चैथे दल के उम्मीदवार परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि उक्रांद का प्रभाव मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों और राज्य आंदोलन से जुड़े मतदाताओं तक सीमित रह सकता है, जबकि आम आदमी पार्टी शहरी क्षेत्रों, शिक्षित युवाओं और बदलाव की राजनीति की तलाश कर रहे मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास करेगी। यदि दोनों दल कुछ क्षेत्रों में प्रभावी चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा और कांग्रेस के वोट प्रतिशत पर असर पड़ सकता है।
फिलहाल राज्य का राजनीतिक परिदृश्य भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर का ही संकेत देता है। लेकिन चुनावी अभियान के दौरान स्थानीय मुद्दों, प्रत्याशियों की लोकप्रियता, दल-बदल और क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर उक्रांद और आम आदमी पार्टी कुछ सीटों पर मुकाबले को रोचक बनाने तथा बड़े दलों के चुनावी गणित को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि भले ही सत्ता की लड़ाई फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के बीच दिखाई दे रही हो, लेकिन छोटे दलों की भूमिका चुनाव परिणामों में निर्णायक साबित हो सकती है।
