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छह दिन तक न मंत्री पहुंचे, न बड़ा नेता

भंडारी की दावेदारी के बीच बदरीनाथ सीट पर उठे सवाल

गोपेश्वर (चमोली)। चुनावी साल में पोखरी मेले का मंच सजा रहा, मुख्य आयोजक राजेंद्र भंडारी लगातार मौजूद रहे, लेकिन भाजपा का कोई बड़ा चेहरा नहीं पहुंचा। छह दिन के आयोजन में मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और वरिष्ठ नेताओं तक की गैरमौजूदगी अब सियासी चर्चा का विषय है। सवाल इसलिए भी अहम है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए पूर्व कैबिनेट मंत्री भंडारी बदरीनाथ विधानसभा सीट से टिकट के दावेदार माने जा रहे हैं।

मेले में भाजपा के बड़े नेताओं की अनुपस्थिति को भंडारी की राजनीतिक स्थिति और पार्टी के स्थानीय समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। चुनाव से पहले जनसंपर्क का इतना बड़ा मंच होने के बावजूद किसी वरिष्ठ नेता का नहीं पहुंचना सवाल छोड़ गया है, क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई संगठनात्मक वजह है? फिलहाल पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है, इसलिए इसे भंडारी की दावेदारी पर भाजपा के रुख का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।

जिस मेले की नींव रखी, उसी में नहीं दिखा भाजपा का बड़ा चेहरा

पोखरी मेले की शुरुआत राजेंद्र भंडारी ने भाजपा सरकार में खादी ग्रामोद्योग मंत्री रहते हुए खादी ग्रामोद्योग मेले के रूप में की थी। उस दौरान मेले के आयोजन के लिए आठ लाख रुपये की व्यवस्था का प्रावधान किया गया था। हर साल खादी ग्रामोद्योग से मेले को धनराशि मिलती रही, लेकिन इस बार यह राशि नहीं मिली। वरिष्ठ नेताओं की गैरमौजूदगी के साथ बजट का नहीं मिलना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि, इन दोनों घटनाक्रमों के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि नहीं हुई है।

बाद में इसका नाम और स्वरूप बदला और अब यह साहित्यकार चंद्र कुंवर बर्त्वाल के नाम से आयोजित हो रहा है। इस बार भी आयोजन में भंडारी की सक्रियता बनी रही, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे दी।

भंडारी की दावेदारी, भाजपा के सामने सियासी संतुलन की चुनौती

कांग्रेस से भाजपा में आए भंडारी के लिए बदरीनाथ सीट पर दावेदारी मजबूत करना अहम है। वहीं, पार्टी के सामने स्थानीय नेताओं के बीच संतुलन और टिकट को लेकर संगठनात्मक समीकरण साधने की चुनौती रहेगी। ऐसे में पोखरी मेले में बड़े नेताओं की अनुपस्थिति ने यह सवाल और प्रासंगिक बना दिया है कि बदरीनाथ सीट को लेकर भाजपा आगे क्या रणनीति अपनाती है।

मेले में किसी बड़े नेता का नहीं पहुंचना अपने आप में भंडारी के पक्ष या विरोध में फैसला नहीं है, लेकिन चुनावी वर्ष में इसने राजनीतिक अटकलों को जरूर तेज कर दिया है। अब सबकी नजर इस पर है कि भाजपा नेतृत्व भंडारी की भूमिका और बदरीनाथ सीट के समीकरणों को लेकर क्या संकेत देता है।

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