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12 साल से फाइलों में कैद गोपेश्वर का बेस अस्पताल

सिमली और गोपेश्वर की अलग-अलग दावेदारी से गरमाई सियासत

गोपेश्वर (चमोली)। चमोली में मेडिकल कॉलेज की मांग अब स्वास्थ्य सुविधा से आगे बढ़कर राजनीतिक दावेदारी का मुद्दा बनती जा रही है। खास बात यह है कि इस बार विपक्ष से ज्यादा सत्तारूढ़ भाजपा के नेता सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। एक ओर गोपेश्वर में 12 साल से फाइलों में अटका बेस अस्पताल है, दूसरी ओर सिमली में बेस अस्पताल की मांग को लेकर आंदोलन की तैयारी है। इसी बीच भाजपा नेता मेडिकल कॉलेज की मांग को लेकर सरकार के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। ऐसे में जिले में मेडिकल के मुद्दे पर भाजपा के भीतर ही श्रेय और नेतृत्व को लेकर खींचतान की चर्चा शुरू हो गई है।

गोपेश्वर के बेस अस्पताल की कहानी वर्ष 2014 में शुरू हुई थी। तत्कालीन बदरीनाथ विधायक राजेंद्र सिंह भंडारी की पहल पर तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने गोपेश्वर में बेस अस्पताल की घोषणा की थी। 10 जुलाई 2014 को शासनादेश जारी कर अस्पताल की स्थापना को मंजूरी दी गई। इसके बाद 31 अगस्त 2016 को जिला अस्पताल से लगी रेशम विभाग की 1.41 हेक्टेयर भूमि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित कर दी गई।

भूमि मिलने के बाद डीपीआर तैयार हुई। उत्तराखंड राज्य अवस्थापना विकास निगम ने प्रारंभिक आगणन तैयार किया। परीक्षण के बाद 67.34 लाख रुपये की स्वीकृति मिली। अस्पताल के लिए आवर्तक और अनावर्तक मद में करीब 1.95 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तथा विशेषज्ञ चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ के पदों का प्रस्ताव भी शासन को भेजा गया। इसके बावजूद परियोजना निर्माण के चरण तक नहीं पहुंच सकी।

गोपेश्वर के बेस अस्पताल को मेडिकल कॉलेज की बुनियादी कड़ी माना जाता है। ऐसे में 12 साल से अस्पताल का लंबित रहना मेडिकल कॉलेज की राह में भी बड़ी अड़चन है। प्रदेश के कई पर्वतीय क्षेत्रों में मेडिकल कॉलेज शुरू हो चुके हैं, लेकिन सीमांत चमोली अभी इस सुविधा से वंचित है।

इस बीच इस मुद्दे का राजनीतिक पहलू भी बदल गया है। जिस बेस अस्पताल की पहल राजेंद्र सिंह भंडारी ने कांग्रेस विधायक रहते की थी, वह अब भाजपा में हैं। दूसरी ओर भाजपा के अन्य नेता भी मेडिकल कॉलेज को लेकर सक्रिय हो गए हैं। भाजपा नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट, प्रभारी मंत्री भरत सिंह चैधरी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने मेडिकल कॉलेज की मांग रखी है। बदरीनाथ विधायक भी सरकार से इस संबंध में गुहार लगा चुके हैं।

यहीं से सवाल केवल मांग का नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक श्रेय का भी बनता है। यदि मेडिकल कॉलेज की दिशा में सरकार कोई ठोस निर्णय लेती है तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि इसकी पहल का श्रेय किसे मिलेगा। पुरानी पहल से जुड़े नेता इसे वर्षों पुराने प्रयास की निरंतरता बता सकते हैं, जबकि मौजूदा भाजपा नेतृत्व इसे सरकार के सामने प्रभावी ढंग से उठाई गई नई मांग के रूप में पेश कर सकता है। यही स्थिति भाजपा के भीतर इस मुद्दे को लेकर प्रतिस्पर्धा की जमीन तैयार कर रही है।

इसी बीच सिमली ने भी बेस अस्पताल के सवाल पर अलग मोर्चा खोल दिया है। सिमली से देहरादून तक 11 सितंबर से पदयात्रा प्रस्तावित है। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे इस बार बेस अस्पताल का शासनादेश लेकर ही लौटेंगे। मांग पूरी नहीं होने पर ‘बेस नहीं तो वोट नहीं’ का नारा बुलंद करने की चेतावनी दी गई है।

इससे चमोली में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर दो अलग-अलग केंद्र उभरते दिख रहे हैं। गोपेश्वर में पुराना स्वीकृत बेस अस्पताल मेडिकल कॉलेज की आधारभूमि के रूप में सामने है, जबकि सिमली में स्थानीय स्तर पर बेस अस्पताल की मांग आंदोलन का रूप ले रही है। दोनों मांगों का आधार जनता की स्वास्थ्य जरूरतें हैं, लेकिन इनके राजनीतिक प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं।

चमोली में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के चलते गंभीर मरीजों को अक्सर देहरादून, ऋषिकेश और अन्य बड़े चिकित्सा केंद्रों के लिए रेफर किया जाता है। दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों से मरीजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में मेडिकल कॉलेज की मांग के पीछे स्वास्थ्य के साथ चिकित्सा शिक्षा, रोजगार और पलायन का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है।

राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए यह मुद्दा दोधारी है। सरकार यदि मेडिकल कॉलेज या बेस अस्पताल की दिशा में ठोस कदम उठाती है तो इसे उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। लेकिन 12 साल से लंबित बेस अस्पताल का सवाल भी साथ खड़ा रहेगा। विपक्ष के लिए यही देरी सरकार से जवाब मांगने का आधार बन सकती है।

फिलहाल चमोली की राजनीति में मेडिकल कॉलेज का मुद्दा एक साथ कई सवाल खड़े कर रहा है, पुराने बेस अस्पताल का क्या होगा, मेडिकल कॉलेज की पहल किस दिशा में बढ़ेगी और इसका राजनीतिक श्रेय किसके खाते में जाएगा? स्वास्थ्य सुविधा की जरूरत अपनी जगह है, लेकिन जिस तरह अलग-अलग स्तर पर दावेदारी सामने आ रही है, उससे साफ है कि चमोली में मेडिकल का मुद्दा अब सियासी जमीन का भी अहम हिस्सा बन चुका है।

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By admin

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