कर्णप्रयाग से सतीश गैरोला की रिपोर्ट
कम संख्या में रह चुके गिद्ध पक्षियों की प्रजाति भी जंगल की आग से खतरे में घिर गई है। इनके घौंसले और अंड़ों को आग से लगातार नुकसान हो रहा है। जंतु वैज्ञानिक भी आग से जंगली जानवरों व पक्षियों को होने वाले नुकसान से खासे चिंतित हैं। पहले ही गिद्ध पक्षियों की संख्या काफी कम हो चुकी है।
मरे हुए पशुओं को खाकर जीवन निर्वहन करने और पर्यावरण को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्ध पक्षियों का जीवन भी जंगलों की आग से संकट में पड़ गया है। जानकार बताते हैं कि गिद्ध पक्षी ऊंचे चट्टानी भागों पर झुंड में रहकर अंडे देते हैं। इनके घौंसलों के आसपास भी घास व अन्य वनस्पति जमी होती है। साथ ही पीरूल भी गिरा होता है। जंगल में आग लगने के दौरान घास पर ऊंची लपटें इनके घौसलों के आसपास भी आग पकड़ देती हैं। जिससे इनके घौंसले या तो जल जाते अथवा आग की तपिश से अंडे खराब हो जाते हैं। वहीं, जंगलों में आग लगने के बाद जंगली जानवर आबादी के बीच भोजन और पानी की तलाश में पहुंच रहे हैं, जो आम लोगों और जंगली जानवरों के लिए घातक है।
कर्णप्रयाग के पर्यावरण प्रेमी जितेंद्र पंवार कहते है कि पहाड़ी क्षेत्रों के जंगलों पर एक चौथाई चीड़ के पेड़ों का कब्जा है। चीड़ के सूखे पेड़ व उनसे गिरा पीरूल तेजी आग पकड़ता है। इनके के नीचे जंगली जानवरों के लिए पैदा होने वाली चारा-पत्ती काफल, हिंसोल, करोंजी, किलमोड़ के पौधे नहीं उगते हैं। बरसात के सीजन में जो वनस्पति उगती भी है वह गर्मी में आग से नष्ट हो जाती है। इससे जानवरों को जंगल में भोजन और पानी नहीं मिल पाता है और वे मानव आबादी में आते हैं। गुलदार और भालू के अंगों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारी कीमत होने से भी वन्य जीव तस्करों की इन पर पैनी निगाह भी होती है।
सूख रहे जलस्रोत, जंगली फलों को भी नुकसान
पहाड़ी क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने के बाद प्राकृतिक जलस्रोत सूखने, जंगली फलों एवं चारा-पत्ती को हुए नुकसान के बाद दुर्लभ जीवों के सामने जान बचाने का संकट पैदा हो गया है।हालत यह है कि जंगली जानवर आबादी के बीच पहुंच रहे हैं, जो इनके और आम लोगों के लिए घातक है।

