गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ भाजपा ने अपने मौजूदा विधायकों की जमीनी स्थिति का आकलन तेज कर दिया है। पार्टी के अंदरूनी सर्वे और फीडबैक को लेकर चर्चा है कि भाजपा की 47 मौजूदा सीटों में से करीब 32 सीटों पर विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी सामने आई है। हालांकि पार्टी ने इन सीटों या संबंधित विधायकों की कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं की है।
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 70 में से 47 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। ऐसे में 2027 में इन सीटों को बचाए रखना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। सर्वे में सामने आ रही कथित नाराजगी को देखते हुए भाजपा मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन और उनकी स्थानीय पकड़ की दोबारा समीक्षा कर सकती है।
बताया जा रहा है कि कई विधानसभा क्षेत्रों में नाराजगी सरकार के बजाय स्थानीय विधायक को लेकर है। सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पलायन और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर लोगों की शिकायतें विधायकों की कार्यशैली और जनता के बीच उनकी सक्रियता से जुड़ी बताई जा रही हैं।
भाजपा के लिए चुनौती केवल कमजोर विधायकों की पहचान तक सीमित नहीं है। यदि मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जाते हैं तो उनके समर्थकों और टिकट के दूसरे दावेदारों को साधना भी पार्टी के लिए बड़ी परीक्षा होगी। कई सीटों पर संभावित दावेदार पहले से सक्रिय हैं। ऐसे में टिकट बदलने की स्थिति में बगावत और भीतरघात का खतरा भी पैदा हो सकता है।
पार्टी के स्तर पर संभावित प्रत्याशियों की जीतने की क्षमता, संगठन में पकड़, बूथ स्तर की स्थिति, स्थानीय सामाजिक समीकरण और विपक्षी उम्मीदवार की ताकत को भी टिकट का आधार बनाए जाने की संभावना है। यानी भाजपा के सामने सवाल केवल यह नहीं होगा कि किस विधायक का टिकट काटना है, बल्कि यह भी होगा कि उसकी जगह कौन उम्मीदवार सीट जीत सकता है।
पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहेंगे, जबकि मैदानी सीटों पर शहरी विकास, रोजगार, महंगाई और स्थानीय सामाजिक समीकरण चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में पार्टी सीटवार रणनीति पर जोर दे सकती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की लोकप्रियता भी भाजपा की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहेगी। पार्टी की कोशिश हो सकती है कि सरकार की उपलब्धियों और मुख्यमंत्री की छवि को स्थानीय विधायकों के खिलाफ नाराजगी से अलग रखा जाए। यदि किसी सीट पर सरकार के प्रति संतोष लेकिन विधायक के खिलाफ असंतोष है तो वहां चेहरा बदलना भाजपा के लिए नुकसान कम करने की रणनीति हो सकती है।
कथित सर्वे में 32 सीटों का आंकड़ा यदि आगे की समीक्षा में भी बना रहता है तो यह भाजपा के लिए बड़ा संकेत होगा। हालांकि इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि इन सभी सीटों पर मौजूदा विधायकों के टिकट कटेंगे। अंतिम निर्णय कई स्तरों से मिलने वाले फीडबैक और चुनावी समीकरणों के आधार पर होने की संभावना है।
2027 से पहले भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती एंटी-इनकंबेंसी कम करने, जिताऊ नए चेहरों की तलाश और टिकट कटने वाले दावेदारों को बगावत से रोकने की होगी। कांग्रेस समेत विपक्षी दल भाजपा की कमजोर मानी जा रही सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारकर इस स्थिति का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करेंगे।
