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संगीता बिष्ट “कौमुदी”

सुबह जब आंख खुली
वह सामने खड़ी मुस्काई
अचंबा हुआ यह देख हमें
कैसी घड़ी है आई ।

पूछ लिया हमने भी हंसकर
क्या तुमने मिश्री है खाई
करवा चौथ है शर्मा कर बोल पड़ी
तुम पर प्रियवर फिर से मोहब्बत है आई।

सुनकर यह दिल गदगद हो गया
पर खर्चा भी कुछ ज्यादा हो गया
उपहार की मांग करते-करते
पीतल का रंग सुनहरा हो गया ।

दिन भर खुद व्रत रखकर
मुझे भी सिर्फ फल खिलाएं
एहसान जताकर हमें
अपने भूख की व्यथा सुनाएं ।

कैसे कहें हम तुमसे प्रिये
तुम एक दिन प्यार जताती हो
हमारे बिना बोले जो कहे
तुम इस दिन कैसे समझ जाती हो ।

दे दो इनको अपने दर्शन
क्यों इनको तरसाते हो
इनकी क्षमता की परीक्षा
क्यों बार-बार छुपकर लेते हो |

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