गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को अभी कुछ महिनों का समय है। चुनावी तस्वीर अभी साफ नहीं है, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियों से मुकाबले की दिशा दिखाई देने लगी है। भाजपा अपने पांच साल के काम और बड़े फैसलों को आधार बनाकर मैदान में उतरने की मन बनाते हुए दिख रही है वहीं कांग्रेस रोजगार, पलायन और महंगाई जैसे सवालों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश करती नजर आ रही है जबकि यूकेडी गैरसैंण, मूल निवास और भू-कानून जैसे क्षेत्रीय मुद्दों पर अपनी जमीन तलाश रही है।
मौजूदा समय में भाजपा के पास चुनाव में बताने के लिए कई बड़े फैसले हैं। समान नागरिक संहिता, भू-कानून, नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, सरकारी भर्तियां, महिला आरक्षण और विकास परियोजनाएं उसके प्रमुख चुनावी मुद्दे हो सकते हैं। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, सड़क कनेक्टिविटी, चारधाम से जुड़ा ढांचा, पर्यटन और निवेश को भी पार्टी अपने विकास के एजेंडे के रूप में सामने रख सकती है।
भाजपा के लिए सवाल यह होगा कि इन उपलब्धियों का असर मतदाताओं की सोच पर कितना पड़ता है। यदि विकास और सरकार के बड़े फैसले चुनावी विमर्श में प्रमुख रहे तो पार्टी को इसका लाभ मिल सकता है। लेकिन रोजगार, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और आपदा जैसी स्थानीय समस्याएं अधिक प्रभावी हुईं तो विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर मिलेगा। पांच साल की सत्ता के बाद स्थानीय स्तर की नाराजगी और विधायकों के प्रति मतदाताओं की धारणा भी कई सीटों पर महत्वपूर्ण हो सकती है।
कांग्रेस की रणनीति इसी संभावित नाराजगी को राजनीतिक मुद्दे में बदलने की होगी। बेरोजगारी और पलायन उसके प्रमुख मुद्दे रह सकते हैं। भर्ती परीक्षाओं, युवाओं के रोजगार, पहाड़ में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति तथा गांवों से पलायन को लेकर पार्टी सरकार को घेर सकती है। महंगाई और आपदा प्रबंधन के सवाल भी चुनावी बहस में शामिल हो सकते हैं। हालांकि कांग्रेस के सामने सरकार विरोधी माहौल को वोट में बदलने की चुनौती होगी। उम्मीदवारों का चयन, संगठन की सक्रियता और पार्टी के भीतर समन्वय इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। विपक्षी वोटों का बंटवारा भी उसके लिए अहम कारक रहेगा।
यूकेडी गैरसैंण को स्थायी राजधानी, मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय अधिकार और पहाड़ के युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों के जरिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को घेर सकती है। यदि यूकेडी कुछ क्षेत्रों में संगठन और मजबूत प्रत्याशी के साथ इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठा पाती है तो कुछ सीटों पर मुकाबले के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि अभी उसके प्रभाव का आकलन करना जल्दबाजी होगी। आम आदमी पार्टी, बसपा, निर्दलीय और बागी प्रत्याशी भी कुछ सीटों पर चुनावी गणित को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर टिकट वितरण के बाद दोनों प्रमुख दलों में असंतोष सामने आता है तो इसका असर करीबी मुकाबलों पर पड़ सकता है।
फिलहाल 2027 की लड़ाई का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। भाजपा के सामने उपलब्धियों को जनसमर्थन में बदलने की चुनौती है तो कांग्रेस के सामने सरकार के खिलाफ सवालों को राजनीतिक विकल्प में बदलने की और यूकेडी के सामने क्षेत्रीय मुद्दों को चुनावी ताकत में बदलने की। आने वाले महीनों में टिकट, प्रत्याशी, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं की प्राथमिकताएं ही तय करेंगी कि चुनावी हवा किस दिशा में जाती है।
